✍🏻✍🏻 संपादक जसीम खान संवाद छत्तीसगढ़ कुसमी बलरामपुर ✍🏻✍🏻

कुसमी के आश्रम-छात्रावासों में दोहरे प्रभार का खेल! 18 किलोमीटर दूर तक एक ही अधीक्षक के जिम्मे दो संस्थान, आदिवासी बच्चों की सुरक्षा पर सवाल

विभागीय नियमों और ‘एक छात्रावास, एक अधीक्षक’ की व्यवस्था पर उठे सवाल, दूसरे विकासखंड के शिक्षक को भी सौंपा गया प्रभार; मंडल संयोजक ने एक सप्ताह में व्यवस्था सुधारने का दिया आश्वासन
लोकेशन: कुसमी, बलरामपुर-रामानुजगंज (छत्तीसगढ़)।
कुसमी। आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग के अंतर्गत संचालित आश्रम-छात्रावासों की व्यवस्था को लेकर कुसमी विकासखंड में सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि विभागीय स्तर पर कुछ शिक्षकों को एक साथ दो-दो आश्रम-छात्रावासों का प्रभार सौंप दिया गया है। इनमें कुछ संस्थान एक-दूसरे से कई किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में रहकर पढ़ाई करने वाले आदिवासी छात्र-छात्राओं की सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और दैनिक देखरेख को लेकर उठ रहा है।
आश्रम-छात्रावास केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए घर की तरह होते हैं, जो अपने परिवार से दूर रहकर शिक्षा प्राप्त करते हैं। ऐसे में इन संस्थानों में अधीक्षक की नियमित उपलब्धता, बच्चों की देखरेख, भोजन की गुणवत्ता, साफ-सफाई, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों और अनुशासन की जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। लेकिन जब एक ही शिक्षक को दो अलग-अलग संस्थानों की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर दोनों जगहों की व्यवस्थाओं की निगरानी किस प्रकार की जा रही है?
कुसमी में सामने आए दोहरे प्रभार के मामलों ने विभागीय कार्यप्रणाली और प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह मांग भी उठने लगी है कि सभी संबंधित आदेशों, मूल पदस्थापना विवरण और अतिरिक्त प्रभार दिए जाने के आधार को सार्वजनिक किया जाए, ताकि पूरी स्थिति स्पष्ट हो सके।
विभागीय निर्देशों के बावजूद दोहरे प्रभार पर सवाल
इस पूरे मामले में आदिम जाति विकास विभाग द्वारा 13 सितंबर 2023 को जारी पत्र क्रमांक एफ 9-7/2010/25-1 का हवाला दिया जा रहा है। बताया जा रहा है कि उक्त पत्र में आश्रम-छात्रावासों में अधीक्षकों की व्यवस्था को लेकर निर्देश दिए गए थे। इसमें सामान्य प्रशासन विभाग के 5 मार्च 2019 के आदेश का भी उल्लेख होने की बात कही जा रही है, जिसके तहत ‘एक छात्रावास, एक अधीक्षक’ की व्यवस्था पर जोर दिया गया था।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि विभागीय स्तर पर एक छात्रावास के लिए एक अधीक्षक की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश हैं, तो फिर कुसमी विकासखंड में एक ही शिक्षक को दो संस्थानों का प्रभार देने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
क्या संबंधित संस्थानों में अधीक्षकों की कमी थी? क्या वैकल्पिक व्यवस्था के लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति ली गई थी? क्या अतिरिक्त प्रभार की अवधि निर्धारित की गई है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या दोनों संस्थानों में बच्चों की नियमित देखरेख के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है। हालांकि, संबंधित आदेशों और प्रभार संबंधी दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि किन मामलों में विभागीय निर्देशों का उल्लंघन हुआ है।
18 किलोमीटर दूर दो संस्थान, एक ही अधीक्षिका के जिम्मे
दोहरे प्रभार को लेकर सबसे गंभीर सवाल पहाड़ी कोरवा बालिका छात्रावास धनेसपुर और कन्या आश्रम कुसमी को लेकर उठ रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन दोनों संस्थानों की दूरी लगभग 18 किलोमीटर बताई जा रही है और दोनों का प्रभार अधीक्षिका बसंती लकड़ा के पास है।
दोनों संस्थान बालिकाओं से संबंधित हैं और इनमें रहने वाली छात्राओं की सुरक्षा तथा देखरेख विशेष संवेदनशीलता का विषय है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक ही अधीक्षिका दोनों जगहों की जिम्मेदारियों का निर्वहन किस प्रकार करती हैं?
यदि किसी छात्रा की तबीयत अचानक बिगड़ जाए, भोजन या अन्य आवश्यक सुविधाओं से जुड़ी समस्या सामने आए अथवा रात के समय कोई आपात स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो संबंधित अधीक्षिका कितनी जल्दी संस्थान तक पहुंच सकेंगी? दोनों स्थानों पर उनकी नियमित उपस्थिति और निगरानी की व्यवस्था क्या है?
इन सवालों का जवाब विभागीय अधिकारियों को स्पष्ट करना चाहिए। साथ ही, दोनों छात्रावासों के दैनिक संचालन, उपस्थिति रजिस्टर और निरीक्षण संबंधी अभिलेखों की जांच से वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
छह किलोमीटर दूर दो संस्थानों का प्रभार, दूसरे विकासखंड के शिक्षक की नियुक्ति पर सवाल
दूसरा मामला बालक आश्रम सीवीलदाग और प्री-मैट्रिक छात्रावास नीलकंठपुर से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों संस्थानों के बीच लगभग छह किलोमीटर की दूरी है और इनका प्रभार जय सिंह को सौंपा गया है।
बताया जा रहा है कि जय सिंह मूल रूप से शंकरगढ़ विकासखंड के माध्यमिक शाला जामपानी में वर्ग-2 के शिक्षक हैं। ऐसे में उनके कुसमी विकासखंड के दो छात्रावासों का प्रभार संभालने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
यह जानना आवश्यक है कि जय सिंह को यह अतिरिक्त जिम्मेदारी किस आदेश के तहत दी गई? क्या उनकी मूल पदस्थापना और वर्तमान दायित्वों के बीच प्रशासनिक समन्वय स्थापित किया गया है? क्या संबंधित सक्षम अधिकारी की स्वीकृति प्राप्त है? और क्या उनके मूल विद्यालय तथा दोनों छात्रावासों की व्यवस्थाएं प्रभावित तो नहीं हो रही हैं?
यदि दूसरे विकासखंड से किसी शिक्षक को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है, तो उसके पीछे प्रशासनिक आवश्यकता और नियमों का आधार स्पष्ट होना चाहिए। इससे किसी भी प्रकार के पक्षपात या अनियमितता की आशंका को दूर किया जा सकता है।
कुसमी और रामनगर के छात्रावास भी दोहरे प्रभार के दायरे में
कुसमी विकासखंड में प्री-मैट्रिक छात्रावास कुसमी और प्री-मैट्रिक छात्रावास रामनगर के प्रभार को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन दोनों संस्थानों के बीच लगभग सात किलोमीटर की दूरी है और दोनों की जिम्मेदारी जयकिशन को सौंपी गई है।
छात्रावासों में अधीक्षक की भूमिका केवल प्रशासनिक हस्ताक्षर या औपचारिक निरीक्षण तक सीमित नहीं होती। उन्हें विद्यार्थियों की उपस्थिति, भोजन, स्वास्थ्य, साफ-सफाई, अनुशासन और अन्य आवश्यक सुविधाओं की निगरानी भी करनी होती है।
ऐसे में एक ही व्यक्ति के पास दो संस्थानों का प्रभार होने से इन जिम्मेदारियों का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है, यह जांच का विषय है। विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि दोनों छात्रावासों में नियमित निगरानी की क्या व्यवस्था है और विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन है।
भूलसी और जिगनिया के आश्रमों का प्रभार भी एक ही अधीक्षक के पास
इसी तरह प्री-मैट्रिक छात्रावास भूलसी और पहाड़ी कोरवा आश्रम जिगनिया को लेकर भी दोहरे प्रभार का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार, दोनों संस्थानों के बीच करीब सात किलोमीटर की दूरी है और इनका प्रभार रत्नेस बंजारे के पास है।
इस मामले में यह चर्चा भी सामने आ रही है कि रत्नेस बंजारे का पदोन्नति के बाद राजपुर में पदस्थापन हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद कुसमी के छात्रावासों का प्रभार उनके पास बना हुआ है।
हालांकि, पदोन्नति, वर्तमान पदस्थापना और अतिरिक्त प्रभार की स्थिति की पुष्टि संबंधित विभागीय आदेशों से होना आवश्यक है। यदि पदस्थापना में बदलाव के बाद भी किसी कर्मचारी को पुराने स्थान पर अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है, तो उसके पीछे सक्षम अधिकारी का आदेश और प्रशासनिक आधार सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित व्यवस्था नियमानुसार है या उसमें सुधार की आवश्यकता है।
‘चढ़ावे’ की चर्चा, लेकिन जांच से ही सामने आएगा सच
दोहरे प्रभार के इन मामलों के बीच विभागीय स्तर पर कथित लेन-देन और पसंदीदा शिक्षकों को जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ शिक्षकों को महत्वपूर्ण प्रभार देने में पारदर्शी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा रिश्वत लेने अथवा देने की बात को प्रमाण के बिना स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। ऐसे आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित आदेशों, फाइल नोटिंग, अनुमोदन और अन्य दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।
फिर भी, जब एक ही विकासखंड में कई संस्थानों के प्रभार को लेकर सवाल उठ रहे हों और दूसरे विकासखंड के शिक्षक को भी जिम्मेदारी दिए जाने की बात सामने आ रही हो, तो विभागीय जांच की मांग को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अतिरिक्त प्रभार देने के लिए क्या मानक तय हैं, जिम्मेदार अधिकारियों ने किन परिस्थितियों में निर्णय लिया और क्या सभी संबंधित मामलों में समान प्रक्रिया अपनाई गई है।
चपरासियों के भरोसे चल रहे छात्रावास? जांच की जरूरत
स्थानीय स्तर पर यह आशंका भी जताई जा रही है कि एक ही अधीक्षक के पास दो-दो संस्थानों का प्रभार होने के कारण किसी एक स्थान पर उनकी अनुपस्थिति में दैनिक व्यवस्थाओं का भार अन्य कर्मचारियों पर पड़ सकता है।
यदि ऐसा है, तो यह जानना जरूरी होगा कि क्या संबंधित कर्मचारियों को निर्धारित जिम्मेदारी सौंपी गई है और क्या उनके पास बच्चों की देखरेख तथा आपात स्थिति में कार्रवाई करने के लिए आवश्यक अधिकार एवं संसाधन उपलब्ध हैं।
विशेष रूप से दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में संचालित छात्रावासों में भोजन, पेयजल, साफ-सफाई, स्वास्थ्य सुविधाओं और छात्र-छात्राओं की सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए। इन व्यवस्थाओं में किसी भी तरह की कमी पाए जाने पर तत्काल सुधार किया जाना आवश्यक है।
इसलिए केवल प्रभार आदेशों की समीक्षा पर्याप्त नहीं होगी। संबंधित छात्रावासों का भौतिक निरीक्षण कर यह भी जांचा जाना चाहिए कि अधीक्षक कितनी नियमितता से उपस्थित रहते हैं और बच्चों को निर्धारित सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं।
ग्रामीणों ने उठाई दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग
इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और छात्र संगठनों के बीच नाराजगी की बात सामने आ रही है। मांग की जा रही है कि कुसमी विकासखंड के सभी आश्रम-छात्रावासों में वर्तमान में पदस्थ अधीक्षकों और प्रभारियों की सूची सार्वजनिक की जाए।
इसके साथ ही संबंधित कर्मचारियों की मूल पदस्थापना, अतिरिक्त प्रभार के आदेश, अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी), सक्षम अधिकारी की स्वीकृति और प्रभार की अवधि से जुड़े दस्तावेज भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
यदि किसी शिक्षक को दूसरे विकासखंड से लाकर अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है, तो उसके प्रशासनिक आधार की जानकारी भी सामने आनी चाहिए।
इन दस्तावेजों के सार्वजनिक होने से न केवल आरोपों की सच्चाई सामने आएगी, बल्कि विभागीय व्यवस्था को लेकर बनी भ्रम की स्थिति भी दूर होगी।
मंडल संयोजक का पक्ष: एक सप्ताह में व्यवस्था सुधारने का दावा
इस मामले में जब मंडल संयोजक से चर्चा की गई, तो उन्होंने बताया कि जिन शिक्षकों को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है, उनकी ओर से आवश्यक एनओसी दी गई है।
मंडल संयोजक ने यह भी कहा कि विभाग की ओर से नए और कड़े निर्देश प्राप्त हुए हैं। उनके अनुसार, आगामी एक सप्ताह के भीतर छात्रावासों में एकल अधीक्षक की व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में कार्रवाई की जाएगी।
उनके इस बयान के बाद अब विभागीय कार्रवाई पर नजर रहेगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्धारित समयसीमा में दोहरे प्रभार समाप्त किए जाते हैं या नहीं और सभी संस्थानों में नियमानुसार अधीक्षकों की व्यवस्था सुनिश्चित हो पाती है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल: बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?
कुसमी विकासखंड के आश्रम-छात्रावासों में दोहरे प्रभार को लेकर उठे सवाल केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। इनका सीधा संबंध उन आदिवासी छात्र-छात्राओं से है, जो शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने परिवार से दूर इन संस्थानों में रहते हैं।
यदि किसी संस्थान में अधीक्षक की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित नहीं है, तो विद्यार्थियों की देखरेख और समस्याओं के समाधान पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए विभागीय अधिकारियों को इस मामले में केवल कागजी आदेश जारी करने के बजाय वास्तविक स्थिति का परीक्षण करना चाहिए।
अब देखने वाली बात यह होगी कि मंडल संयोजक द्वारा दिए गए एक सप्ताह के आश्वासन के बाद विभाग क्या कदम उठाता है। क्या सभी छात्रावासों में एकल अधीक्षक की व्यवस्था लागू होगी? क्या कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी? और क्या जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णयों का आधार सार्वजनिक किया जाएगा?
फिलहाल कुसमी के आश्रम-छात्रावासों की व्यवस्था को लेकर उठे सवालों के बीच विभागीय पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
