बलरामपुर: जान जोखिम में डालकर उफनती नदी पार करने को मजबूर ग्रामीणों की वर्षों से पुल की मांग, बरसात में बढ़ी मुश्किलें।

Samwad Chhattisgarh

✍🏻 संपादक जसीम खान संवाद छत्तीसगढ़ कुसमी बलरामपुर

बलरामपुर: विकास खण्ड कुसमी की धनेशपुर नदी में जान जोखिम में डालकर उफनती नदी पार करने को मजबूर ग्रामीण, वर्षों से पुल की मांग, बरसात में बढ़ी मुश्किलें।

बलरामपुर/कुसमी। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के विकासखंड कुसमी अंतर्गत ग्राम पंचायत धनेशपुर एवं आसपास के कई गांवों के ग्रामीण आज भी बरसात के मौसम में अपनी जान जोखिम में डालकर उफनती जंगली नदी पार करने को मजबूर हैं। वर्षों से पुल निर्माण की मांग किए जाने के बावजूद अब तक कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी है, जिससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के दिनों में नदी का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है। इसके बावजूद बच्चों, महिलाओं, किसानों, मरीजों और आम लोगों को आवश्यक कार्यों के लिए इसी नदी को पार कर कुसमी बाजार पहुंचना पड़ता है। पुल नहीं होने के कारण हर बार नदी पार करना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा होता है।

ग्रामीणों के अनुसार उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और क्षेत्र के नेताओं से पुल निर्माण की मांग की, लेकिन आज तक उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया। ग्रामीणों का आरोप है कि हर बार केवल आश्वासन मिलता है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

ग्रामीणों ने बताया कि बरसात के दौरान कई बार लोग नदी की तेज धारा में बह चुके हैं। कई घटनाओं में मोटरसाइकिलें भी पानी के तेज बहाव में बह गईं। इसके बावजूद प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर से अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शीघ्र पुल का निर्माण नहीं कराया गया तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा हो सकता है। उन्होंने शासन-प्रशासन से मांग की है कि ग्रामीणों की सुरक्षा को देखते हुए धनेशपुर क्षेत्र की इस जंगली नदी पर जल्द से जल्द पुल का निर्माण कराया जाए, ताकि बरसात के मौसम में लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार न करनी पड़े, जब भी बारिश होती है तो नदी उफान पर रहती है नदी के इस पार और उस पार वाहनों और लोगों की जाम लग जाती है पानी कम होने का इंतजार करनी पड़ती है ।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी वर्षों पुरानी मांग पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे सामूहिक रूप से आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस गंभीर समस्या को कितनी प्राथमिकता देता है और ग्रामीणों को इस जानलेवा परेशानी से कब तक राहत मिलती है।

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