
चांगरो के जीराफूल चावल को मिलेगी नई पहचान, किसानों और महिला समूहों की आय बढ़ाने प्रशासन बनाएगा विशेष कार्ययोजना

सामरी विधायक उद्धेश्वरी पैकरा और कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी ने ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर किया संवाद, जैविक खेती, ब्रांडिंग और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने पर जोर

✍🏻✍🏻 संपादक जसीम खान संवाद छत्तीसगढ़ कुसमी बलरामपुर ✍🏻 ✍🏻
बलरामपुर, 23 अक्टूबर 2026।छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के शंकरगढ़ विकासखंड अंतर्गत ग्राम चांगरो में पारंपरिक जीराफूल चावल की खेती को नई पहचान दिलाने और इससे जुड़े किसानों एवं महिला स्व सहायता समूहों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में पहल की जा रही है। शुक्रवार को सामरी विधायक श्रीमती उद्धेश्वरी पैकरा, कलेक्टर श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी ने ग्राम चांगरो पहुंचकर ग्रामीणों और किसानों से आत्मीय संवाद किया। इस दौरान जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने जमीन पर बैठकर किसानों की बातें सुनीं तथा उनकी खेती, उत्पादन, विपणन और आजीविका से जुड़े विषयों पर चर्चा की।
ग्राम चांगरो के किसान वर्षों से जैविक पद्धति से जीराफूल चावल की खेती कर रहे हैं। यह केवल उनकी आजीविका का साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र की पारंपरिक कृषि विरासत और विशिष्ट पहचान भी है। किसानों के इस प्रयास की सराहना करते हुए विधायक और अधिकारियों ने जीराफूल चावल की खेती को प्रोत्साहित करने, इसकी गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार में बेहतर पहचान दिलाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस दौरान जीराफूल चावल की व्यवस्थित खेती, उत्पादन क्षेत्र के विस्तार, ब्रांडिंग और किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार करने पर चर्चा हुई।
जीआई टैग प्राप्त जीराफूल चावल अपनी सुगंध और स्वाद के लिए प्रसिद्ध
जीराफूल चावल अपनी विशिष्ट सुगंध, छोटे और पतले दानों तथा प्राकृतिक स्वाद के कारण अलग पहचान रखता है। इसके दाने जीरे के समान पतले होने के कारण इसे जीराफूल नाम से जाना जाता है। मार्च 2019 में इसे भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त हुआ, जो इसकी विशिष्ट पहचान और पारंपरिक महत्व को रेखांकित करता है।
पकने के दौरान इसकी मनमोहक सुगंध आसपास के वातावरण में फैल जाती है। अपने स्वाद और सुगंध के कारण यह चावल बाजार में विशेष मांग रखता है। इसकी कीमत लगभग 100 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम तक बताई जाती है। ऐसे में यदि किसानों को बेहतर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार की सुविधा उपलब्ध होती है, तो इस पारंपरिक फसल से उनकी आय बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
विधायक उद्धेश्वरी पैकरा ने जैविक खेती को बढ़ावा देने पर दिया जोर
सामरी विधायक श्रीमती उद्धेश्वरी पैकरा ने किसानों के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने और जैविक पद्धति से खेती को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि ग्राम चांगरो का जीराफूल चावल क्षेत्र की अनमोल पहचान है। इसकी विशिष्ट सुगंध और गुणवत्ता को केवल जिले तक सीमित रखने के बजाय प्रदेश और देशभर में पहचान दिलाने के प्रयास किए जाने चाहिए।
विधायक ने किसानों और महिला स्व सहायता समूहों को भरोसा दिलाया कि जीराफूल चावल की खेती से जुड़े लोगों की आर्थिक समृद्धि के लिए हरसंभव सहयोग किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्थानीय कृषि उत्पादों को प्रोत्साहन मिलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और किसानों के साथ-साथ इस कार्य में जुटी महिलाओं के लिए भी आय के नए अवसर विकसित हो सकेंगे।
विशेष कार्ययोजना से होगी ब्रांडिंग और बेहतर विपणन की व्यवस्था
कलेक्टर श्रीमती चंदन संजय त्रिपाठी ने कहा कि जीराफूल चावल को व्यवस्थित तरीके से बाजार तक पहुंचाने और किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य दिलाने के लिए राज्य शासन के सहयोग से बेहतर विपणन की व्यवस्था सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए विशेष कार्ययोजना तैयार कर चांगरो के जीराफूल चावल की प्रभावी ब्रांडिंग पर जोर दिया जाएगा।
कलेक्टर ने बताया कि शंकरगढ़ क्षेत्र के लगभग 30 गांवों में जीराफूल चावल की खेती की जा रही है। इस खेती को और अधिक गांवों तक विस्तारित करने तथा उत्पादन को व्यवस्थित स्वरूप देने की दिशा में भी प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि जीराफूल उत्पादक किसानों और इस कार्य से जुड़ी महिला स्व सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रशासन आवश्यक कदम उठाएगा।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसानों को उनकी उपज के लिए उचित बाजार, बेहतर मूल्य और विपणन की सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है। इसके लिए किसानों को संगठित कर उत्पादन से लेकर बिक्री तक की प्रक्रिया को मजबूत बनाने पर काम किया जाएगा।
10 महिला स्व सहायता समूह खेती से जुड़े, एफपीओ से जोड़ने के निर्देश
ग्राम चांगरो में जीराफूल चावल की खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों में 10 महिला स्व सहायता समूह सक्रिय हैं। प्रत्येक समूह में लगभग 12 से 15 महिलाएं कार्यरत हैं। इन समूहों की भागीदारी से यह स्पष्ट होता है कि जीराफूल चावल की खेती ग्रामीण महिलाओं की आजीविका और आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
कलेक्टर ने इन स्व सहायता समूहों को शंकरगढ़ में स्थापित आत्मनिर्भर बलरामपुर किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) से जोड़ने के निर्देश दिए। इसका उद्देश्य किसानों और समूहों को संगठित व्यवस्था के माध्यम से कम लागत पर बेहतर गुणवत्ता वाली कृषि सामग्री एवं आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराना है। एफपीओ से जुड़ाव होने पर सामूहिक रूप से उत्पादन, संसाधनों के उपयोग और विपणन को अधिक प्रभावी बनाने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
प्रशासन का प्रयास है कि किसान और महिला समूह अलग-अलग स्तर पर काम करने के बजाय संगठित होकर अपनी उपज की गुणवत्ता, बिक्री और बाजार तक पहुंच को मजबूत कर सकें। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने और ग्रामीण परिवारों की आय में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।
राइस मिल और इलेक्ट्रिक ढेंकी की स्थापना पर भी चर्चा
जीराफूल चावल की गुणवत्ता बनाए रखने और किसानों को स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ग्राम क्षेत्र में राइस मिल स्थापित करने पर भी चर्चा की गई। इसके साथ ही पारंपरिक लकड़ी की ढेंकी के आधुनिक विकल्प के रूप में इलेक्ट्रिक ढेंकी स्थापित करने की संभावना पर विचार किया गया।
स्थानीय स्तर पर धान की कुटाई और चावल तैयार करने की सुविधाएं विकसित होने से किसानों एवं महिला समूहों को प्रसंस्करण के लिए दूरस्थ स्थानों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही चावल की पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बिक्री की प्रक्रिया को भी बेहतर बनाया जा सकता है।
चांगरो के जीराफूल चावल को संगठित उत्पादन, आधुनिक प्रसंस्करण, प्रभावी ब्रांडिंग और बेहतर बाजार से जोड़ने की यह पहल क्षेत्र की पारंपरिक कृषि को आर्थिक अवसरों में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि प्रस्तावित कार्ययोजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो इससे जीराफूल चावल की पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित करने के साथ-साथ किसानों और महिला स्व सहायता समूहों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

