
✍🏻 संपादक जसीम खान संवाद छत्तीसगढ़ कुसमी बलरामपुर
हंसपुर रामनरेश हत्याकांड : अब तत्कालीन कलेक्टर और प्रशासनिक जांच दल की भूमिका पर उठे बड़े सवाल, क्या होगी नई एफआईआर दर्ज..?
क्या पैरेलल प्रशासनिक जांच के जरिए पुलिस विवेचना को प्रभावित करने की हुई कोशिश..?
23 मार्च की सुनवाई पर टिकी सबकी नजर..!
बलरामपुर / कुसमी। बलरामपुर जिले के कोरंधा थानाक्षेत्र अंतर्गत बहुचर्चित हंसपुर रामनरेश हत्याकांड में अब एक नया और गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। मामला अब केवल हत्या और आरोपी अधिकारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि तत्कालीन कलेक्टर द्वारा गठित प्रशासनिक जांच दल की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या पुलिस विवेचना के समानांतर एक अलग प्रशासनिक जांच चलाकर मूल जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई..?
दस्तावेजों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार कार्यालय कलेक्टर, बलरामपुर-रामानुजगंज द्वारा आदेश क्रमांक 709/कले०/विविध/2026, दिनांक 17 फरवरी 2026 जारी कर एक जांच दल गठित किया गया था। आरोप है कि उक्त जांच दल ने उसी घटना से जुड़े गवाहों एवं व्यक्तियों के बयान दर्ज किए, जिनकी गवाही पहले से पुलिस विवेचना के पन्ने में थी।
सबसे अधिक विवाद इस बात को लेकर हो रहा है कि तहसील कार्यालय कुसमी के माध्यम से कुछ ऐसे व्यक्तियों को बुलाया गया, जिनके बयान पुलिस ने घटना के तुरंत बाद तत्परता दिखाकर पहले ही दर्ज कर लिया था। और कुछ दिनों बाद ही देखा गया कि उनके बयान उसी एसडीएम कार्यालय के दफ्तर में दर्ज कराए गए जहाँ न्यायालिक अभिरक्षा पर जेल में बंद हत्या के आरोपीत एवं निलंबित तत्कालीन एसडीएम करुण डहरिया बैठा करता था। साथ जांच टीम में शामिल वर्तमान कुसमी एसडीएम अनमोल विवेक टोप्पो को शामिल किया गया. जिसकी डहरिया से गहरा सम्बन्ध प्रचारित होता रहा हैं।
“पहले कभी ऐसी पैरेलल जांच क्यों नहीं हुई?”
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठाया जा रहा है कि बलरामपुर जिले में पूर्व में भी अनेक शासकीय अधिकारी एवं कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज हुए हैं, लेकिन उन मामलों में कभी भी कलेक्टर स्तर पर समानांतर प्रशासनिक “पैरेलल” जांच नहीं बैठाई गई। ऐसे में यह विशेष “मेहरबानी” केवल तत्कालीन एसडीएम करुण डहरिया के मामले में ही क्यों दिखाई गई..? जबकी करुण डहरिया का कार्यकाल शुरू से ही विवादित देखा जाता रहा हैं। और डहरिया ने गरियाबंध में अपने “रिश्तवत खोरी” का छाप भी छोड़ रखा हैं।
पुलिस विवेचना और ट्रायल प्रक्रिया को प्रभावित किया जा सकता है..?
स्थानीय कई वर्गो ने पान के ठेले व चाय कि दुकान पर सरेआम बहस किया है कि छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश के इतिहास में भी सामान्यतः ऐसा देखने को नहीं मिला है कि किसी शासकीय कर्मचारी या अधिकारी पर आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद उसी अधिकारी के विभाग या वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा उस आपराधिक घटना की समानांतर तथ्यात्मक जांच शुरू कर दी जाए। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि भविष्य में हर उस मामले में, जिसमें कोई शासकीय अधिकारी आरोपी हो, उसके पक्ष में इस प्रकार की समानांतर प्रशासनिक जांच शुरू होने लगे, तो न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर असर पड़ सकता है। साथ ही इससे किसी भी आरोपी अधिकारी को विभागीय संरक्षण देकर पुलिस विवेचना और ट्रायल प्रक्रिया को प्रभावित किया जा सकता है, जो न्याय के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत माना जाएगा।
क्या कलेक्टर कोई अन्वेषण एजेंसी है..?
कलेक्टर के आदेश पर “पैरेलल” पर कई गंभीर कानूनी प्रश्न भी उठ रहे हैं. कलेक्टर द्वारा यह जांच किस वैधानिक प्रावधान के तहत गठित की गई..? क्या हत्या जैसे आपराधिक मामले की तथ्यात्मक जांच करना जिला प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है..? क्या कलेक्टर कार्यालय या प्रशासन कोई “अन्वेषण एजेंसी” है..? जब पुलिस पहले से विवेचना कर रही थी, तब प्रशासनिक स्तर पर गवाहों के बयान अलग से दर्ज कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी..? स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि जिस प्रकार तत्कालीन एसडीएम कुसमी पर अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर ट्रक वाहन को पकड़कर छत्तीसगढ़ लाने का आरोप लगा था, ठीक उसी प्रकार अब तत्कालीन कलेक्टर द्वारा भी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर समानांतर जांच कराए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
सुलगते सवाल…जो हर जानकारों के जुबान में…?
पुलिस विवेचना के साक्ष्य को प्रशासन के साथ विवेचना के दौरान शेयर क्यो करती..? क्या प्रशासन कोई अन्वेषण एजेंसी है..? क्या तत्कालीन कलेक्टर द्वारा सीधे तौर पर एसडीएम के ख़िलाफ़ जुटाए साक्ष्य को जाँच दल की आड़ में माँग कर पुलिस विवेचना को दूषित करने का एवं हत्यारे एसडीएम को तत्कालीन कलेक्टर एवं पूरे प्रशासनिक अमले द्वारा बचाने का प्रयास नहीं था.? क्या यह बीएनएस की धारा 229, 232, 233, 236, 238, 246 और 255 को आकर्षित नहीं करता..? क्या तत्कालीन कलेक्टर के विरुद्ध उक्त धराओ में अपराध पंजीबद्ध नहीं करना चाहिए..? साक्ष्य को दूषित करना, बदलना एवं गवाहो को साम-दाम-दंड-भेद लगाकर और प्रशासनिक आतंक के माध्यम से प्रभावित करना तथा गवाहों को उसी कुसमी कार्यालय में बुलाकर बयान लेना, जहाँ आरोपी तत्कालीन एसडीएम पदस्थ रहा था, समकक्ष के वर्तमान एसडीएम से जांच कराकर क्या गवाहों पर प्रशासनिक दबाव बनाने जैसा नहीं था..?
इंतजार का परिणाम 23 को..
जिस तरह तत्कालीन एसडीएम कुसमी द्वारा अपने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर ट्रक गाड़ी को लूट कर छत्तीसगढ़ लाने का प्रयास किया गया, उसी तरह तत्कालीन कलेक्टर बलरामपुर द्वारा भी अपने क्षेत्रधिकार से बाहर जाकर इस सम्पूर्ण पैरेलल जांच को पैरेलल विवेचना के तर्ज पर करवाकर पुलिस विवेचना को बाधित एवं दूषित करने का प्रयास किया गया ये स्पष्ट रूप से प्रथम दृष्टिया प्रमाणित हो रहा है। चर्चाए हैं कि माननीय न्यायालय को उक्त बातो पर संज्ञान लेकर तत्काल प्रभाव से पूरे जांच दल पर उक्त धाराओ में अपराध पंजीबद्ध करने के आदेश नहीं देने चाहिए..? या पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर उक्त मामले में एफआईआर पंजीबद्ध करेगी? इस इंतजार का परिणाम 23 मार्च दिन शनिवार को ही मिल पाएगा।
सनावल में नहीं, हंसपुर में जांच क्यों..प्रशासनिक जांच पर दोहरे मापदंड..?
मामले को लेकर अब एक और बड़ा सवाल स्थानीय स्तर पर उठाया जा रहा है। लोगों का कहना है कि सनावल क्षेत्र में अवैध रेत उत्खनन से जुड़े चर्चित प्रकरण में, जहाँ एक पुलिस आरक्षक की जान चली गई थी और मामला सीधे माइनिंग विभाग से संबंधित था, तब जिला प्रशासन द्वारा किसी प्रकार की “पैरेलल प्रशासनिक जांच” गठित नहीं की गई। जबकि उस मामले में अवैध उत्खनन के गंभीर आरोप और व्यापक चर्चाएँ सामने आई थीं। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर केवल थाना कोरंधा क्षेत्र के ग्राम हंसपुर में 15/16 फरवरी की घटना के बाद ही विशेष जांच दल गठित करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई..? क्या प्रशासन यह मान रहा है कि जिले के अन्य थाना एवं चौकी क्षेत्रों में अवैध बाक्साइट उत्खनन की कोई शिकायत या गतिविधि नहीं है..?
स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि यदि अवैध उत्खनन की जांच ही उद्देश्य था, तो फिर पूरे जिले में संचालित कथित अवैध खनन गतिविधियों की व्यापक जांच क्यों नहीं कराई गई..? केवल एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ी घटना के संदर्भ में ही अलग से प्रशासनिक जांच दल गठित होना अब कई नए सवाल खड़े कर रहा है।
