सरगुजा में पत्रकारों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों के खिलाफ दर्ज चार FIR की निष्पक्ष जांच की मांग, वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन देने का उल्लेख।

Samwad Chhattisgarh

✍🏻✍🏻 संपादक जसीम खान संवाद छत्तीसगढ़ कुसमी बलरामपुर ✍🏻✍🏻

सरगुजा में पत्रकारों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों के खिलाफ दर्ज चार FIR की निष्पक्ष जांच की मांग, वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन देने का उल्लेख


परस्पर विरोधी शिकायतों, नामजद व्यक्तियों की भूमिका और डिजिटल साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा की उठी मांग; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के निष्पक्ष पालन पर जोर

अम्बिकापुर/सरगुजा। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं (एक्टिविस्टों) और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स के खिलाफ दर्ज शिकायतों को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग उठी है। इस मामले में जागरूक नागरिकों और प्रभावित पक्षों की ओर से मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) तथा पुलिस अधीक्षक सहित वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किए जाने का उल्लेख किया गया है। आवेदन के माध्यम से संबंधित प्राथमिकी, परस्पर विरोधी शिकायतों, नामजद व्यक्तियों की भूमिका और डिजिटल साक्ष्यों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष समीक्षा की मांग की गई है।

आवेदनकर्ताओं ने आशंका जताई है कि जनहित के मुद्दों को सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से सामने लाने वाले कुछ लोगों को शिकायतों तथा कथित अपमानजनक टिप्पणियों के जरिए दबाव में लाने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है। संबंधित शिकायतों में लगाए गए आरोप सही हैं या किसी मामले में दुर्भावनापूर्ण शिकायत की गई है, इसका निर्धारण पुलिस की निष्पक्ष विवेचना और उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही किया जा सकता है।

4 अक्टूबर 2026 को दर्ज चार FIR की समीक्षा की मांग

आवेदन में 4 अक्टूबर 2026 को अम्बिकापुर के कोतवाली थाना और अजाक थाना में दर्ज बताई गई चार प्राथमिकी का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। आवेदनकर्ताओं ने इन मामलों के घटनाक्रम, प्राथमिकी दर्ज होने के समय, संबंधित शिकायतों और प्रत्येक नामजद व्यक्ति की कथित भूमिका की अलग-अलग समीक्षा किए जाने की मांग की है।

आवेदन में उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, चारों प्राथमिकी का विवरण इस प्रकार है।

1. एफआईआर क्रमांक 0702/2026 — थाना कोतवाली

बताए गए विवरण के अनुसार, यह प्राथमिकी 4 अक्टूबर 2026 को शाम 6:04 बजे दर्ज की गई। इसमें आकांक्षा टोप्पो को शिकायतकर्ता तथा धीरज सिंह को नामजद व्यक्ति बताया गया है। आवेदन में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख होने की बात कही गई है। संबंधित धाराओं और आरोपों की सटीक पुष्टि प्राथमिकी की प्रमाणित प्रति से की जानी आवश्यक है।

2. एफआईआर क्रमांक 0015/2026 — अजाक थाना

आवेदन में दी गई जानकारी के मुताबिक, यह प्राथमिकी 4 अक्टूबर 2026 को रात 9:26 बजे दर्ज बताई गई है। इसमें सुनीता सोनहा शिकायतकर्ता और रविन्द्र तिवारी नामजद व्यक्ति बताए गए हैं। आवेदनकर्ताओं ने इस मामले को भी संबंधित घटनाक्रम के संदर्भ में देखते हुए आरोपों, बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष समीक्षा की मांग की है।

3. एफआईआर क्रमांक 0703/2026 — थाना कोतवाली

उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह प्राथमिकी 4 अक्टूबर 2026 को रात 9:32 बजे दर्ज की गई। इसमें शैलेन्द्र शर्मा शिकायतकर्ता बताए गए हैं, जबकि आकांक्षा टोप्पो, अकील अहमद अंसारी और अन्य व्यक्तियों के नाम शामिल होने की जानकारी दी गई है। आवेदनकर्ताओं का कहना है कि इस मामले में प्रत्येक व्यक्ति की कथित भूमिका का स्वतंत्र रूप से परीक्षण किया जाना चाहिए, ताकि किसी व्यक्ति के विरुद्ध केवल नाम शामिल होने के आधार पर निष्कर्ष न निकाला जाए।

4. एफआईआर क्रमांक 0704/2026 — थाना कोतवाली

आवेदन में चौथी प्राथमिकी 4 अक्टूबर 2026 को रात 10:38 बजे दर्ज होना बताया गया है। इसमें धीरज सिंह शिकायतकर्ता तथा आकांक्षा टोप्पो और कैमरामैन दिनेश यादव नामजद व्यक्ति बताए गए हैं। आवेदनकर्ताओं ने इस प्रकरण को पहले दर्ज मामलों और संबंधित प्रतिशिकायतों के साथ संदर्भ सहित देखते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।

उल्लेखनीय है कि उपरोक्त विवरण आवेदन में उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित हैं। चारों प्राथमिकी की प्रमाणित प्रतियों, उनमें दर्ज कानूनी धाराओं और पुलिस के आधिकारिक पक्ष का स्वतंत्र सत्यापन किए बिना किसी मामले के आरोपों या संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

परस्पर विरोधी शिकायतों में प्रत्येक पक्ष की बात सुनने की मांग

आवेदनकर्ताओं का कहना है कि जब किसी घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हैं, तो जांच के दौरान सभी शिकायतों और आरोपों का निष्पक्ष परीक्षण किया जाना चाहिए। किसी एक पक्ष की शिकायत को स्वतः सही या दूसरे पक्ष की शिकायत को स्वतः गलत मानकर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

उनके अनुसार, शिकायत दर्ज होना अपने आप में आरोप सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। इसी तरह, किसी शिकायत को बिना पर्याप्त जांच के झूठा या दुर्भावनापूर्ण घोषित करना भी उचित नहीं होगा। इसलिए घटनाक्रम की शुरुआत, शिकायत दर्ज होने का क्रम, संबंधित व्यक्तियों के बयान, उपलब्ध दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों को समग्र रूप से परखा जाना चाहिए।

आवेदन में यह भी मांग की गई है कि प्रत्येक नामजद व्यक्ति की वास्तविक भूमिका का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो उन आरोपों के समर्थन में मौजूद सामग्री और लागू कानूनी प्रावधानों का परीक्षण आवश्यक है।

सोशल मीडिया पर सक्रियता को आपराधिक षड्यंत्र का स्वतः प्रमाण न माना जाए

आवेदन में सोशल मीडिया पर जनहित के मुद्दों को साझा करने और पत्रकारों, एक्टिविस्टों तथा इंफ्लूएंसर्स के बीच संपर्क के विषय को भी उठाया गया है। आवेदनकर्ताओं का तर्क है कि किसी घटना की जानकारी साझा करना, किसी पोस्ट को आगे बढ़ाना, पीड़ित का पक्ष सामने लाना या एक ही जनसमस्या पर कई लोगों का सक्रिय होना अपने आप में आपराधिक षड्यंत्र का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

उनका कहना है कि यदि किसी मामले में आपराधिक षड्यंत्र या अन्य गंभीर अपराध का आरोप लगाया गया है, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका, उनके बीच कथित समन्वय, कथित कृत्य और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण आवश्यक है। केवल आपसी संपर्क या सोशल मीडिया पर एक ही विषय पर सक्रियता के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय आरोपों को कानूनी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

हालांकि, सोशल मीडिया पर किसी सामग्री को साझा करना हर परिस्थिति में कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होता। किसी पोस्ट, वीडियो या संदेश की प्रकृति, उसमें मौजूद कथन, उसे साझा करने की परिस्थितियां और संबंधित कानूनों के प्रावधानों के आधार पर ही उसकी वैधानिक स्थिति तय की जा सकती है।

ऑडियो-वीडियो और डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच पर जोर

सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में डिजिटल सामग्री महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है। किसी वीडियो, ऑडियो क्लिप, स्क्रीनशॉट, चैट या संदेश को आधार बनाकर आरोप लगाए जाने की स्थिति में उसकी प्रामाणिकता, मूल स्रोत और संदर्भ की जांच आवश्यक हो सकती है।

आवेदनकर्ताओं ने मांग की है कि संबंधित मामलों में उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों का आवश्यकता के अनुसार तकनीकी परीक्षण कराया जाए। इसमें मूल फाइल, उपलब्ध मेटाडेटा, रिकॉर्डिंग के संदर्भ, संबंधित डिवाइस और अन्य प्रासंगिक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की जांच शामिल हो सकती है।

उनका कहना है कि अधूरी रिकॉर्डिंग, संपादित वीडियो या संदर्भ से अलग किए गए संदेश के आधार पर किसी व्यक्ति की भूमिका के संबंध में जल्दबाजी में निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए। वहीं, शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत डिजिटल सामग्री को भी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांचा जाना चाहिए, ताकि साक्ष्य की वास्तविकता स्पष्ट हो सके।

आवेदनकर्ताओं के मुताबिक, डिजिटल साक्ष्यों की निष्पक्ष और तकनीकी जांच से घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति सामने लाने में मदद मिल सकती है।

       वरिष्ठ अधिकारियों से की गई प्रमुख मांगें

आवेदन में संबंधित प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों से कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की मांग का उल्लेख किया गया है।

– चारों प्राथमिकी की समीक्षा: 4 अक्टूबर 2026 को दर्ज बताई गई एफआईआर क्रमांक 0702/2026, 0015/2026, 0703/2026 और 0704/2026 के आरोपों, दर्ज धाराओं, समयक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की जाए।
– प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका का अलग-अलग परीक्षण: केवल नामजद होने के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति के कथित कृत्य और उसके समर्थन में मौजूद साक्ष्यों की जांच की जाए।
– डिजिटल साक्ष्यों का तकनीकी परीक्षण: संबंधित ऑडियो, वीडियो, स्क्रीनशॉट, सोशल मीडिया पोस्ट और संदेशों की प्रामाणिकता की आवश्यकता के अनुसार विशेषज्ञों से जांच कराई जाए।
– परस्पर विरोधी शिकायतों की निष्पक्ष विवेचना: सभी संबंधित पक्षों की शिकायतों, बयानों और दस्तावेजों को ध्यान में रखते हुए जांच आगे बढ़ाई जाए।
– कानूनी प्रावधानों का उचित प्रयोग: आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की जाए।
– जांच में पारदर्शिता और जवाबदेही: विवेचना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार हो और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले।
– पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों का संरक्षण: जनहित के मुद्दे उठाने वाले लोगों के वैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाए, साथ ही शिकायतकर्ताओं के अधिकारों और सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के पालन के बीच संतुलन जरूरी

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। पत्रकारिता, जनसमस्याओं को सामने लाना, प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े सवाल पूछना और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। हालांकि, यह अधिकार कानून के अधीन है और इसके प्रयोग में अन्य व्यक्तियों के अधिकारों तथा लागू कानूनी प्रावधानों का भी ध्यान रखना आवश्यक है।

इसी प्रकार, किसी व्यक्ति को शिकायत दर्ज कराने और कानून के तहत कार्रवाई की मांग करने का अधिकार है। इसलिए किसी भी विवाद में शिकायतकर्ता की बात सुनना, आरोपित व्यक्ति को कानून के अनुसार अपना पक्ष रखने का अवसर देना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच करना जरूरी है।

आवेदनकर्ताओं का कहना है कि जनहित के मुद्दे उठाने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज शिकायतों की जांच में किसी भी प्रकार का बाहरी दबाव या पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि निष्पक्ष विवेचना से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य हैं और किन बिंदुओं पर आगे जांच की आवश्यकता है।

       अब पुलिस की कार्रवाई पर टिकी नजरें

सरगुजा में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों से जुड़े इन मामलों में आवेदनकर्ताओं ने वरिष्ठ अधिकारियों से संज्ञान लेकर निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने की मांग की है। आवेदन में मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, डीजीपी, आईजी सरगुजा रेंज और एसपी सरगुजा को आवेदन सौंपे जाने का उल्लेख किया गया है।

अब इस मामले में संबंधित अधिकारियों की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। चारों प्राथमिकी के आधिकारिक अभिलेखों, संबंधित पक्षों के बयानों, डिजिटल साक्ष्यों और पुलिस की विवेचना से ही घटनाक्रम के विभिन्न पहलुओं की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

फिलहाल, आवेदनकर्ताओं की मुख्य मांग है कि सभी संबंधित मामलों की जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और साक्ष्य-आधारित तरीके से की जाए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप प्रमाणित होते हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो और यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोप साक्ष्यों से पुष्ट नहीं होते, तो उसके वैधानिक अधिकारों की भी रक्षा सुनिश्चित की जाए।

नोट: यह समाचार आवेदन में उपलब्ध कराई गई जानकारी और आवेदनकर्ताओं की मांगों पर आधारित है। आवेदन सौंपे जाने, प्राथमिकी के विवरण तथा संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष की स्वतंत्र पुष्टि प्रकाशन से पहले करना उचित होगा।

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